मीरा कांत लगभग दो दशक से निरंतर अपने कथा-साहित्य, नाटकों तथा कभी-कभार कविताई और निबंधों के माध्यम से सिर्फ़ हाशिए पर जगह पाने वाले निरूपाय मनुष्य की पीड़ा को नेपथ्य से मंच के बीचोबीच लाने में सचेष्ट हैं। संघर्षशील स्त्री और समाज की मुख्यधारा से छूटे हुए व्यक्ति इनके साहित्य की धुरी रहे हैं। यही कारण है इन्होंने उपेक्षित और प्रताड़ित नारी को केन्द्र में रखकर सृजन किया तो नाटककार भुवनेश्वर प्रसाद जैसी लगभग विस्तृत साहित्यिक प्रतिभा को याद करते हुए रचनात्मक जगत में विसंगतियों से जूझती प्रतिभाओं के दर्द को भी वाणी दी है। 

इन्होनें कश्मीरी डायस्पोरा तथा शारीरिक और मानसिक रूप से पिछ्ड़े हुए हतभाग्य व्यक्तियों की व्यथा को भी वाणी दी। इनका साहित्य सिर्फ़ ढर्रे से चले आ रहे मानव-संबंधों की कहानी नहीं है। वह मानव-संबंधों में व्याप्त सत्ता और अधिकार के संघर्ष के भंवर का सुराग भी ढूंढ़ता है।

मीरा कांत प्राय: गद्य लिखना पसंद करती हैं परन्तु किन्हीं अवसरों पर कुछ प्रसंग उन्हें इतना उद्वेलित व बेचैन कर देते हैं कि वे लम्बी कविताओं के रूप में भी उस दर्द की कहानी को काव्यात्मक सुरों में पेश करती हैं। उनकी इधर लिखी दो कविताओं में एक असम के संदर्भ में देश की सामाजिक-राजनैतिक शोषणकारी व्यवस्था को चुनौती देती है तो दूसरी कविता मर्द की निगाह में औरत की रूढिवादी छवि को खुलकर ललकारती है।

इधर वे रहस्यवादी मीरा घोषित की जाने वाली महादेवी वर्मा के प्रखर पत्रकार रूप को सामने लाने का उद्यम कर रही हैं। उनका एक लम्बा शोध लेख नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली पुस्तक का एक हिस्सा है।

वैचारिक तत्त्व की प्रधानता ने इनके यात्रा-विवरणों को भी एक नयी तर्ज़ दी है। यूरोप भ्रमण का वर्णन करते हुए मीरा कांत ने 'प्रेत प्रश्नों के घिरते साये' में जिन अंतराष्ट्रीय प्रश्नों की निशानदेही की है वह उनकी तत्संबंधी गहरी समझ का सबूत है।

मीरा कांत के नाटक 'ईहामृग','भुवनेश्वर दर भुवनेश्वर' और 'हुमा को उड़ जाने दो' की भूमिकाएं डा. सुषमा भटनागर ने लिखी हैं। ये भूमिकाएं परिष्कृत गद्य का नमूना होने के साथ ही इन नाटकों की आंतरिक लय की सम भी हैं।

1958 में श्रीनगर में जन्मी मीरा कांत ने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम. ए. तथा जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पीएच. डी. किया। शोध का विषय था — अंतराष्ट्रीय महिला दशक में हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका। सम्प्रति मीरा कांत राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण् परिषद (एन.सी.ई.आर.टी), नई दिल्ली में सम्पादक हैं। अब तक इन्हें अपने सृजन के लिए निम्न सम्मान प्राप्त हुए हैं —

 
  • साहित्यकार सम्मान 2005-2006, हिन्दी अकादमी, दिल्ली।
  • नेपथ्य राग (नाटक) के लिये मोहन राकेश सम्मान 2003 (प्रथम पुरस्कार), साहित्य कला परिषद, दिल्ली।
  • ईहामृग (नाटक) के लिये सेठ गोविन्द दास सम्मान, 2003 ।
  • तत:किम (उपन्यास) के लिये अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति पुरस्कार, 2004 ।
  • भुवनेश्वर दर भुवनेश्वर (नाटक) के लिये निष्ठा सांस्कृतिक मंच, गुड़गांव के छठे अखिल भारतीय नाटक महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ कथानक पुरस्कार, 2006 ।
  • ’ऐसा हो तो कैसा हो’(फ़िल्म आलेख) को प्रथम पुरस्कार, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार, 1992 ।  

मीरा कांत की रचनाएं हैं —

नाटक

उपन्यास

कहानी संग्रह

लम्बी कविताएं

  • तुम क्या निर्वस्त्र करोगे मुझे?
  • ध से धूल कब साफ़ होगी?  

बाल साहित्य

  • नाम था उसका आसमानी
  • ऐसे जमा रेल का खेल  

शोध

अनूदित साहित्य (अंग्रेज़ी)

  • इन द विंग्स (नेपथ्य राग) (नाटक)
    (साहित्य अकादेमी की पत्रिका 'इंडियन लिटरेचर' में मई-जून 2004 में प्रकाशित। अनुवाद : मनु विक्रमन)
  • हर्ड बट नेवर सीन (कन्धे पर बैठा था शाप/श्रूयते न तु दृश्यते) (नाटक)
    (साहित्य अकादेमी की पत्रिका 'इंडियन लिटरेचर' में जनवरी-फरवरी 2007 में प्रकाशित। अनुवाद : मनु विक्रमन)
  • डिस्रोब मी वॉट यू विल!
    (इम्फाल फ्री प्रैस, 2 जुलाई 2006 में प्रकाशित। अनुवाद : सुहासिनी और मनु)
     








कश्मीरी से अनुवाद

लल दयद — एन सी ई आर टी की कक्षा 9 की हिन्दी पाठय पुस्तक 'क्षितिज' के लिये कश्मीर की संत कवयित्री ललेश्वरी के चुनिंदा वारखों पदों का कश्मीरी से हिन्दी में अनुवाद।



मीरा कांत के साहित्य पर शोध 

दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्वाधान में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. रमेश गौतम के परामर्श से 'मीरा कांत के नाटक नेपथ्य राग में स्त्री-प्रश्न' के विषय पर वर्ष 2007 में शोध संपन्न।

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