अंतरराष्ट्रीय महिला दशक और हिन्दी पत्रकारिका
इस शोध-ग्रंथ में अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष और फिर दशक (१९७४-१९८५) के परिप्रेक्ष्य में स्त्री की बनती-बिगड़ती तस्वीर को कुछ हटकर, कुछ रूख बदलकर देखने का प्रयास किया गया है। इस रूप में यह इस समयावधि की सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति पर भी एक टिप्पणी है क्योंकि किसी भी युग में स्त्री के दर्जे का अध्ययन पूरे समाज पर एक टिप्पणी का काम देता है।
हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं में इन ग्यारह वर्षों में प्रकाशित लेखों, सम्पादकीयों, निबंधों, खबरों, व्यंग्य-चित्रों आदि के विषय-विश्लेषण में इसी कोण से युग के उल्लेखनीय योगदान को आंका गया है।
इन ग्यारह वर्षों की पत्रकारिता को पृष्ठाधार प्रदान करने वाली लगभग एक शताब्दी पुरानी हिन्दी पत्रकारिता और उसमें स्त्री के बदलते चेहरे का अध्ययन भी इस पुस्तक का विषय रहा है।
यह पुस्तक उस यात्रा के मील के पत्थरों से पहचान कराती है जिसमें हिन्दी पत्रकारिता ने अंतरराष्ट्रीय महिला दशक के आलोक में स्त्री को अगोचर से गोचर बनाने की भूमिका निभाई।
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असंभव समय की आत्मसंभवा संपादिका: महादेवी वर्मा, एम. ए
प्राय: रहस्यवादी घोषित की जाने वाली महादेवी वर्मा के प्रखर पत्रकार रूप को सामने लाने का भी मीरा कांत उद्यम कर रही हैं। उनका एक लम्बा शोधपरक लेख 'असंभव समय की आत्मसंभवा संपादिका: महादेवी वर्मा, एम. ए,’ नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा डा. चंद्रा सदायत के सम्पादन में शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली पुस्तक का हिस्सा है।
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