Reviews

Nepathya Raag

(एन.एस.डी. के भारत रंग महोत्सव २००४, भारतेन्दु नाटय उत्सव २००५ ' साहित्य कला परिषद के तत्वावधान में वर्ष २००३ में और Delhi International Arts Festival में 2009 में श्रीराम सेंटर, नई दिल्ली में मंचित। निर्देशक : भारती शर्मा।)

Meera Kant’s ‘Nepathya Raag’ is a well constructed play and fully deserves the first prize it won at the playwriting competition that is organised by the Sahitya Kala Parishad every year.

Romesh Chander
The Hindu, 10 Oct 2003

Meera has successfully used an ancient tale to raise the issue of gender bias.

G. George
The Statesman, 10 Oct 2003

महिलाओं की पहचान का संघर्ष है 'नेपथ्य राग'।

नवभारत टाइम्स , 3 अक्टूबर 2003

मीरा कांत नारी विमर्श की गंभीर एवं संवेदनशील नाटककार हैं। इनकी सोच का केन्द्रीय-बिन्दु यह है, कि देश-काल चाहे कोई भी हो, बुद्धिमती-विदुषी स्त्री को पुरूष समाज कभी बर्दाश्त नहीं कर पाता। . . . आज के आक्रामक स्त्री-विमर्श/व्यवहार और स्वछंदतादायी आधुनिकता या उत्तर-आधुनिकता के बावजूद बुनियादी स्थिति में कोई मूलमूत अन्तर नहीं आया है। हाँ, समयानुसार पुरूष द्वारा स्त्री को अपने हक में इस्तेमाल करने के तरीके और तेवर ज़रूर कुछ बदल गए हैं।

जयदेव तनेजा
रंग प्रसंग, जुलाई-सितम्बर 2007

इस प्रकार के नाटकों के बार-बार मंचन होने चाहिये और नाटयालेख पर संवाद होना चाहिये। . . . यह नाटक तो अतिकथन और बोझिल संवादात्मकता से भी मुक्त है जो आरोप प्राय: हिन्दी नाटकों पर लगाया जाता है। मीरा कांत भारतीय परम्पराओं के साथ भाषा की लय और संवाद-रचना पर वह अधिकार रखती हैं जिससे 'रंग-मंच का काव्य' और 'आंतरिक शिल्प' का प्रस्फुटन होता है। इस मायने में वह पूर्णत: रंगमंच की भाषा है।

गिरीश रस्तोगी
शब्द शिखर, जून-जुलाई 2005
 

यह नाटक प्राचीन प्रसंगों में आधुनिक समस्याओं की पड़ताल का प्रयास है। . . . मंचन की दृष्टि में यह नाटक बहुत ही उपयोगी साबित होगा।

नवभारत टाइम्स, 6 फरवरी 2005

'नेपथ्य राग' एक उज्ज्वल भविष्य का संकेत देता है।

सिद्धनाथ कुमार
'समीक्षा', जुलाई-सितम्बर 2004


Bhuvaneshwar dar Bhuvaneshwar

('अनामिका' के तत्वावधान में शाहजहांपुर में वर्ष २००६ में मंचित । निर्देशक : चंद्रमोहन महेन्द्रू। बनारस,गुङगांव,लखनऊ और बरेली मैं भी प्रदर्शन। 'समानान्तर' द्वारा 1 नवम्बर 2009 को इलाहाबाद में भी मंचित| कोलकाता , जबलपुर , भोपाल आदि में भी मंचित । निर्देशक: अनिल रंजन भौमिक.' कनक थियेटर ग्रुप ' द्वारा २०१० और २०१२ में दिल्ली में मंचित . निर्देशक : सुशील गौतम . लखनऊ दूरदर्शन की ओर से मार्च २०१२ में एक संगोष्ठी का आयोजन तथा राष्ट्रीय स्तर पर प्रसारण. )

नाटककार ने यथार्थ और फैंटेसी तथा अतीत और वर्तमान के कल्पनाशील ताने-बाने से एक दिलचस्प और उत्तेजक रंगमंचीय नाटक की रचना की है।

जयदेव तनेजा
. रंगप्रसंग, जुलाई-सितम्बर 2007

ऐसा लगता है मानो मीरा कांत के भीतर भुवनेश्वर कहीं गहरे जीवित हैं जिसकी आह उनके शब्दों में रच बस कर प्रतिध्वनित होती है। मीरा कांत भुवनेश्वर की संवेदना को अपनी आत्मा में इस तरह उतारती हैं कि इन दोनों की संवेदना का भेद मिट जाता है और जक्सटा पोज़िशन की तरह दिखने लगता है जिसे लवण-नीर संयोग कह सकते हैं।

इज़हार अहमद नदीम
शब्द शिखर, जनवरी 2007

मीरा कांत के इस नाटक के बहाने भुवनेश्वर फिर फोकस में है, उनके निजी जीवन के बारे में फैलाई दंतकथाओं से दूर यह नाटक उनके विचार पक्ष को जानने-दिखाने की एक सार्थक व मूल्यवान कोशिश है।

सुधीर विदयार्थी
अमर उजाला,बरेली, 14 अप्रैल 2006

भुवनेश्वर दर भुवनेश्वर में मीरा कांत का लेखन त्रिआयामी विशेषताओं को खोलता है। पाठक यह तय नहीं कर पाता कि भुवनेश्वर की जीवनी पढ़ रहा है या भुवनेश्वर का यह नाटक या फिर मीरा कांत की रचना और यही रचना की सबसे बडी ताकत भी है। अपनी जटिलताओं के बीच लेख और लेखक की संवेदनाओं को भीतर समाए इस कृति को अदभुत कहा जा सकता है।

राजेश कुमार दुबे
अक्षर पर्व, मार्च 2006


Kandhe par baitha tha shaap

('प्रयोग' के तत्वावधान में भोपाल में वर्ष 2008 में मंचित। निर्देशक-प्रो.सतीश मेहता। क्षितिज थियेटर ग्रुप के तत्त्वावधान में वर्ष २०१० में दिल्ली में मंचित । निर्देशक-भारती शर्मा ।)

वक्त के बदलाव और स्त्रियों के दखल के साथ हिन्दी नाटक में भी बदलाव आ रहे हैं। मीरा कांत इस का प्रमाण हैं। नाटक न तो ऐतिहासिक है, न ही इसकी ऐतिहासिकता महत्वपूर्ण है। महत्वपूर्ण है स्त्री प्रश्न जिसे अनदेखा किया जाता रहा है। इस दृष्टि से मीरा कांत ने नाटक के क्षेत्र में अहम हस्तक्षेप किया है।

राजकुमार
इंडिया टुडे, 4 अप्रैल 2007


दृष्टिभेद के साथ नाटक में कदमताल कर रही मीरा कांत का नाटक 'कन्धे पर बैठा था शाप' स्त्रीवादी दृष्टि से लिखा गया है। सिर्फ़ फ़ैशन या चमक का मामला नहीं है बल्कि अनुपस्थित को उपस्थित करने, छुपे प्रंसगों को सामने लाने और हाशियाकृत को केंद्रकृत करने वाला है। कह सकते हैं नाटक मैं 'पैराडाइम शिफ़्ट' है। नाटक के फोकस या केन्द्र बिन्दु बदलने से पाठ बदल रहे हैं।

राजकुमार
लोकायत, 16-31 दिसंबर 2007


मीरा कांत अपने नाटकों का विषय खोजने इतिहास और मिथकों की धरोहर में चली जाती हैं, किन्तु ठीक प्रसाद की ही तरह उनका उददेश्य भी इतिहास का वर्णन करना नहीं है, अपितु वे तो इसके माध्यम से वर्तमान और उससे जुड़े कई संदर्भों को अधिक स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करती हैं। उत्तर आधुनिक शैली में कहें, तो यह इतिहास और मिथक का पुनर्पाठ है।

ज्योति चावला
हिन्दुसतान, 1 अप्रैल 2007


Kaali Barf

(श्रीराम सेंटर रेपर्टरी द्वारा वर्ष २००५ में मंचित। निर्देशक : मुश्ताक काक। दूरदर्शन के चैनेल ' कशीर ' में ' काली बर्फ ' नाम से ही तेरह कड़ियों का धारावाहिक प्रसारित . निर्देशक : मुश्ताक काक )

Srinagar born author Meera Kant’s new play is as much a dirge for the dispossessed Kashmiri people as a paean to the resilience they continue to display after decades of violence and strife in their homeland.

Kavita Nagpal
Asian Affairs, May 2005

True after Mohan Rakesh there was a void for some time but there are many upcoming playwrights joining their ranks is Meera Kant. . . . Meera Kant’s ‘Kaali Barf’ is a poignant play built around the plight of displaced Kashmiris.

Romesh Chander
The Hindu, 25 Feb 2005

The play brings out hopes and fears of the Kashmiri Diaspora. . . . With an idea of reaching out to the common man, this play has endeavoured to strike a special balance by expressing its dialogues in the common tongue with a liberal sprinkling of the vernacular that brings with it the aroma of the valley’s saffron.

Aruna Bhowmick
Sahara Times, 12 March 2005

Dr. Meera Kant’s play ‘Kali Barf’ (Black Snow) is a powerful tragedy with long episodes of pain, intercepted by short ones of hope and happiness. It also reflects the invidious struggle in the hearts of Kashmiri Pandits who still have faith in the innate characteristics of Kashmiriyat and lingering hope in humanness and lofty Kashmiri mental make-up.

D.P. Bhan
Kashur Gazette, 21-27, May 2005

Emotion is the central chord in the story, nostalgia tinged with tender love and loss on the mind of every character.

Aruna Bhowmick
The Statesman, 4 March 2005

नाटक की विशेषता यह है कि उसमें एक बात आहिस्ता से कही गयी है। बगैर किसी राजनैतिक कमेंट या उत्तेजना के मीरा कांत मानो एक यथार्थ के संवेदनात्मक पहलू को हमारे सामने लाती हैं। वे हालात की निराशा के बावजूद उम्मीद को अपने कथ्य में शरीक करती है। नाटक का शीर्षक इसी उम्मीद का एक बिंब हैं। . . . सूफियाना धुनों से युक्त धनंजय कौल के संगीत के ज़रिये वे उस कश्मीरियत का मानो एक वातावरण बनाते हैं जिसका ज़िक्र नाटक में कई मौकों पर आता है। वे विषय के तर्क को इस वातावरण के ज़रिये एक प्रवाह में बदलते हैं, यह उनकी उपलब्धि है। सेट में दो अलग-अलग परिवेशों और समय-प्रसंगों के लिए एक उपयुक्त कल्पनाशील सज्जा थी। अभिनय, प्रकाश योजना आदि में भी मुश्ताक की निर्देशकीय छुअन स्पष्ट दिखाई देती है।

संगम पांडेय
जनसत्ता, 21 फरवरी 2005


Ihamrig

(अमैच्योर थियेटर ग्रुप, जम्मू की ओर से मुश्ताक काक के निर्देशन में वर्ष २००३ में उज्जैन के अखिल भारतीय कालिदास समारोह और २००२ में श्रीराम सेंटर, नई दिल्ली में मंचित।))

रिश्तों की गहराइयों को नापता 'ईहामृग'।

नवभारत टाइम्स, दिल्ली
27 दिसम्बर 2002

सत्य और मिथ्या के बीच नारी मन की अन्तर्व्यथा 'ईहामृग'।

दैनिक मध्यांचल, उज्जैन
9 नवम्बर 2003

नाटक पंचतत्वों में संतुलन के सिद्धांत के इर्द-गिर्द घूमकर मानव स्वभाव व संबंधों की गहराई नापता है। नाटक में रागात्मक संबंधों के माध्यम से इन विचार बिंदुओं की लय है 'ईहामृग'। मानव संबंधों की गहराइयों को समझाने वाला यह नाटक अत्यंत ही रोचक है।

दैनिक भास्कर, उज्जैन
8 नवम्बर, 2003

सम्पूर्णता की तलाश में बेचैनी लिए 'ईहामृग'।

डा. शैलेन्द्र कुमार शर्मा
दैनिक भास्कर, उज्जैन
9 नवम्बर, 2003

हिन्दी रंगकर्म के महाकाश पर इन दिनों नए आलेखों के अभाव का गगनभेदी रूदन सुनाई पड़ रहा है। ऐसे समय में निरंतर नए आलेखों का प्रकाशित होना एक सुखद अहसास ही कहा जा सकता है। ऐसा ही एक आलेख है मीरा कांत लिखित 'ईहामृग'।

मृत्युंजय कुमार प्रभाकर
समकालीन भारतीय साहित्य
जनवरी - फरवरी 2004

खुले रंगमंच पर बड़े दर्शक वर्ग के समक्ष दार्शनिक सवालों से जूझते हुए 'ईहामृग' का मंचन क्लासिकी आयोजन में आज के हिन्दी रंगकर्म की दस्तक का प्रतीक बनकर आया, जिसने प्रेक्षकों के मन को थोड़ा मथने में कामयाबी पाई और क्लासिकी नाटय और समकालीन रंगानुभव के बीच संचरण की पुलक भी प्रेक्षकों को दी।

अशोक वक्त
नई दुनिया, उज्जैन
9 नवम्बर 2003


उनकी कहानियाँ स्त्री के प्रति विषमता भरी स्थितियों से उपजे दर्द का प्रवाह है ।
- कुमार पंकज
जनसत्ता ,28 फरवरी 1999


Bahati Vyatha Sateesar

('रंगयुग’ के तत्वावधान में वर्ष २००५ में जम्मू में मंचित।)

From portraying the orientation and backdrop of present day Kashmir, the play with broaden  reference touches at its far end the ‘global village’ and exposes the so-called benign designs of the super power. The pain of Sateesar (Kashmir) is seen spread all over the globe.

Lalit Gupta
Daily Excelsior, Jammu

6 Feb 2005

Rangyug  Theatre group staged Meera Kant’s Hindi play ‘Vyatha Sateesar’ at Abhinav Theatre here today. . . . The play brought to fore the very plight of Kashmiri Pandits who had to migrate from Kashmir.

State Times, Jammu
6 Feb 2005


Kagazi Burj

संग्रह की सभी कहानियों में ज़िन्दगी की पूरी संजीदगी उपन्यास के विराट कलेवर में विस्तार पाती सी दिखाई देती है। जीवन की त्रासदियों, तल्खियों के बीच भी इनके पात्र पूरी संवेदना और मानवीय जिजीविषा से सिक्‍त ज़िन्दगी से पलायन नहीं करते बल्कि उसके बीच से ही अपने तरीके से रास्ता तलाश कर औरों के लिए भी मार्ग बना देते हैं। एकान्विति की ऐसी सघनता बहुत ही कम कहानियों में उतरते दिखाई देती है।
-चंद्रकला
समयान्तर, अक्टुबर 2008

‘अनसुलझे स्त्री प्रश्न’
-तृप्ता
जनसता, 13 जुलाई 2008

कविता और गद्य के बीच की पारम्परिक दीवार ढहाती इस गरिमामयी भाषा की बदौलत विचारों के प्रक्षेपण के दौरान भी कहानियों का कहानीपन अक्षुण रहता है .निस्संदेह इन कहानियों से होकर गुज़रना एक अनुभव से होकर गुज़रना है .
-डॉ विजय प्रकाश
परिकथा , नव . - दिस . 2008

मीरा कांत की भाषा पर बेजोड़ पकड है . यही वजह है वह शब्दों का जाल बुनकर पाठकों को संवेदना के स्तर पर झकझोरने में कामयाब होती हैं .
-नविता
समकालीन भारतीय साहित्य , नव . - दिस . 2009

चाहे स्त्री विमर्श हो या विस्थापन की पीड़ा, इतिहास की रिसती दीवारों की बीच घुटती स्मृतियां हों या आज की स्वार्थ लोलुपता और सामंती मनोवृत्ति के कारण लरजती मौन आहें- मीरा कांत की कहानियाँ इनकी तहों में जाकर दृष्टि से सूक्ष्म अवलोकन करती हैं। पहले नारियां नारी सम्बन्धी बातों को कहने एवं लिखने में कितनी हिचकिचाहट महसूस करती थीं ,देखने - सुनने वालों को पता है पर अब तो खुले रूप में जिस तरह से वर्णन करतीं हैं , पुरुष दांतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर हो जाता है।
-रीता सिन्हा
राष्ट्रीय सहारा, 15 फ़रवरी 2009

आठ कहानियों के इस संग्रह में मीरा कांत ने सच का निर्वसनित रूप उजागर किया है।
-जनार्दन मिश्र
इंडिया न्यूज़, 26 जुलाई से 1 अगस्त 2008

मिथक , इतिहास और स्मृति का बोध उन्हें समकालीन रचनाकारों से अलग करता है और नयी पहचान के तौर पर उपस्थित करता है .---यहाँ भाषा भावों के अनुरूप बनती भाषा नहीं है बल्कि भावों को लयबद्ध प्रस्तुत करती है .
- रीनू गुप्ता
संवेद , जनवरी 2010


Huma Ko Ud Jaane Do

इस नाटक में मीरा कांत ने हुमांयू के जीवन के अनछुए पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की है जो एक ओर शायरी, ज्योतिष, सूफ़ी-संतो ओर आध्यात्मिक चिंतन के लिए व्याकुल था और दूसरी ओर हिन्दुस्तान फ़तह करके एक पुत्र और एक पिता की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए छ्टपटा रहा था। इस दृष्टि से ऐतिहासिक होकर भी इसके पात्रों का शुध्द ऐतिहासिक न होना और लेखिका का युगबोध इसमें लक्षित किया जाना लेखकीय कुशलता और उनके युगीन संवेदना के संवहन का परिचायक है।
-रीता सिन्हा
जनसत्ता, 16 नवम्बर 2008

दिल्ली में हुमायूं के मकबरे के पास कोने में एक छोटा-सा मकबरा है जिसे हुमायूं के हज्जाम(नाई) का मकबरा माना जाता है। इस पात्र के ज़रिए भी मीरा ने हुमायूं के दिल की दुनिया के छोटे से गवाह को दर्शकों के सामने रखा है।
-विनीत उत्पल
राष्ट्रीय सहारा, 15 मार्च 2009

Meera kant enjoys playing with time, but this does not dilute her ability to potray both the past and the present with dramatic immediacy and vividness.... Meera Kant's nuanced potrayal of the emperor, in the final analysis, Huma ko Ud Jane Do is not merely about Humayun and Hamida, it is also about the larger question of relationship between the individual and power, politics and destiny.

- Ranjana Kaul
The Book Review
Feb, 2011


URF Hitler

'आउटडेटेड' होने का खतरा उठाकर मीरा कांत ने जिस तरह से घरेलू और निजी ज़िन्दगी में बनने वाले वर्चस्व और सत्ता के दुरुपयोग पर सामाजिक यथार्थ को रचा है, बहुत ही महत्वपूर्ण है।
-राज कुमार
इंडिया टुडे, 30 जनवरी 2008

यह लघु उपन्यास स्त्री - पुरुष के कृत्रिम बंटवारे से विरत होकर व्यापक मानवतावादी दृष्टि से मानव त्रासदी का अवगाहन करता है . किसी पंथ विशेष का चुल्लूभर आचमन नहीं .
-सुषमा भटनागर
लोकायत ,1 - 15 मई 2008

बड़े - बड़े नारों , संघर्षों और पूरी दुनिया को उलट - पुलट देने वाली दृष्टियों के इस दौर में परम्परागत हिटलरी की भेंट चढ़ती मनुष्यता और पारिवारिकता को बचा लेने की चिंता से प्रेरित मीरा कांत का यह उपन्यास सही मायने में हिंसा और स्वतंत्रता के दमन को एक ही बिंदु पर रखकर मानवीय त्रासदी के एक बड़े प्रश्न को विमर्श में लाने का गंभीर उद्यम करता है .
-ज्योतिष जोशी
परिकथा , जुलाई - अगस्त 2008


Ant Haazir Ho

(अमैच्युर थियेटर ग्रुप, जम्मू के तत्वावधान में वर्ष 2008,2009 और 2010 में जम्मू और दिल्ली में मंचित। निर्देशक-मुश्ताक काक)


In this play she has touched upon a topic that many writers would not dare to take up. And instead of sensationalising the theme, of which there was every possibility, she has dealt with the issue with a great degree of sensitivity and compassion. This is what makes the play a very passionate potrayal of a topic that demands our serious attention.

-Ravinder kaul
Daily excelsior, 19 feb. 2008

रोज़ाना की ज़िन्दगी के टुकड़े से नाटक कैसे उगाया जा सकता है , यह देखना हो तो इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिलेगा .
- प्रेम पाल शर्मा
भारतीय रेल , जून 2012


Ek Koi Tha//Kahin Nahin - Sa

Meera Kant's Novel Ek koi tha/Kahin nahin-Sa, brings out the similarity between those who were left behind in the valley and those who have come out and are trying to build a life. Their pain of not being able to arrive. Those who had to leave are living a life in a diaspora and those left behind are forced to live in the constant fear of terrorism. Those in the camps, ironically have to be identified by a C/o Refugee Camp... address in their own country, and those, who are still in the valley are looking for their lost Kith and Kin through organizations like, 'Association of Disappeared Persons'. It is ironical that a place which reminded of heaven on earth seethes with anguish and pain of human lives.

- Meenakshi Khar
Hindi, Oct-Dec 2010

यह उपन्यास उस कश्मीरियत को खोने की पीड़ा है जो सत्ता ,राजनीति एवं आतंक की भेंट चढ़ गयी . यहाँ इतिहास के तह में अनदेखी की जाती पीड़ा एवं सिसकियाँ हैं .
- राजीव कुमार
हिन्दुस्तान , 12 सितम्बर 2010

यह उपन्यास कश्मीरी जनजीवन की बाहरी - भीतरी तब्दीलियों का जीता - जागता आख्यान है . जड़ों से विलग सूखे पत्तों की तरह यहाँ -वहां उड़ रहे उजड़े कश्मीरी जन कब तक जिंदा रह पायेंगे अपनी संस्कृति के साथ ? ऐसे ज़रूरी सवाल अंत तक हमारा पीछा नहीं छोड़ पाते .
- रजनी गुप्त
इंडिया टुडे , 8 दिसंबर 2010

मीरा कांत मानवीय संवेदना की गंभीर रचनाकार हैं . उनका यह तीसरा उपन्यास स्त्री लेखन की उस सीमा पर प्रहार करता है जो मानकर चलता है कि स्त्री विमर्श खुद स्त्री लेखन कि सीमा बनता है और स्त्रियाँ गंभीर मुद्दों को उतनी गंभीरता से नहीं ले पातीं.
- रीनू गुप्ता
परिकथा ,सित. - अक्तू . 2010


Gali Dulhanwali


स्त्री जीवन से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों पर रचनात्मक बहस को आमंत्रित करती प्रतीत होतीं हैं मीरा कांत की कहानियां .
- प्रेमा नेगी
समकालीन भारतीय साहित्य , सित . - अक्तू . 2009

संग्रह में स्त्रियाँ अलग - अलग परिवेश , वर्ग और पीढ़ी से हैं . कई कहानियों में एक ही परिवार की तीन -तीन पीढ़ी की औरतों के साझे सपने , उत्पीडन और साझे संकल्प का मार्मिक वर्णन है .निश्चित रूप से इन्हीं के बीच से होकर जीवन - सत्य की खोज और परीक्षण की कोशिश है , जिसमें संग्रह की सफलता असंदिग्ध है .
- निरंजन सहाय
जनसत्ता , 15 नवम्बर 2009